इस वर्ष के अंतर्राष्ट्रीय मुक्त पहुँच सप्ताह (19–25 अक्टूबर) का विषय है - “ज्ञान की कीमत”।

ज्ञान का सृजन और उसका साझा इसलिए करते हैं ताकि मानवीय समझ का विस्तार हो और जनहित को बढ़ावा मिले। हमारा विश्वास है कि ज्ञान तक पहुँच और उसका आदान-प्रदान एक मौलिक मानवाधिकार है। इसके बावजूद, ज्ञान तक पहुँच और उसे साझा करने की लागत निरंतर बढ़ती जा रही है और कई बार अत्यधिक होती है। यह प्रश्न स्वाभाविक है: ऐसा क्यों हो रहा है, और इससे लाभ किसे मिल रहा है?

ज्ञान के विभिन्न पहलुओं पर बढ़ते केंद्रीकरण और व्यावसायिक नियंत्रण की एक स्पष्ट कीमत है। इस वर्ष का विषय हमें ज्ञान के सृजन, साझाकरण और संरक्षण से जुड़ी वित्तीय, मानवीय और पर्यावरणीय लागतों पर गंभीरता से विचार करने के लिए प्रेरित करता है—विशेषकर तब, जब ये लागतें सार्वजनिक हित के बजाय निजी हितों से संचालित होती हैं। पिछले वर्ष का विषय “हमारे ज्ञान का मालिक कौन है?” ज्ञान के व्यावसायिक स्वामित्व की वास्तविकता को उजागर करता था; वहीं इस वर्ष का विषय उस वास्तविकता की लागतों को समझने और इन प्रणालियों पर पुनः सार्वजनिक नियंत्रण स्थापित करने के उपायों पर केंद्रित है।

ये लागतें केवल पत्रिकाओं की सदस्यता शुल्क या लेख प्रसंस्करण शुल्क (APCs) तक सीमित नहीं हैं। लेखकों, समीक्षकों और संपादकों द्वारा दिए गए समय और श्रम का मूल्य क्या है , और यह अक्सर अवैतनिक श्रम किन हितों की पूर्ति करता है? दुनिया की बड़ी आबादी को ज्ञान के सृजन, साझाकरण और संरक्षण में समान भागीदारी से वंचित रखने की क्या कीमत है? स्वदेशी डेटा संप्रभुता को न मानने के क्या परिणाम हैं? शोध कार्यों को बिना सहमति या पारिश्रमिक के स्वामित्वाधीन AI प्रशिक्षण के लिए क्यों उपयोग किया जा रहा है? और ज्ञान साझा करने वाले प्लेटफॉर्म उपयोगकर्ताओं की निगरानी क्यों करने लगे हैं? साथ ही, जब डेटा केंद्रों को प्राथमिकता दी जाती है, तब बिजली और पानी जैसी मूलभूत आवश्यकताओं पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?

वर्तमान व्यवस्था न तो न्यायसंगत है और न ही तटस्थ। इसे बनाए रखना भी निष्पक्ष नहीं है। ऐसी ज्ञान-साझाकरण प्रणालियों का निर्माण, जो वास्तव में उन समुदायों के हितों को प्रतिबिंबित करें जिनकी वे सेवा करती हैं, इसके लिए व्यक्तिगत और सामूहिक प्रतिबद्धता आवश्यक है।

सकारात्मक पक्ष यह है कि कई प्रेरक उदाहरण सामने आ रहे हैं, जो यह दर्शाते हैं कि ज्ञान का सृजन, संरक्षण और साझाकरण सार्वजनिक हित में कैसे किया जा सकता है। स्वदेशी डेटा गवर्नेंस मॉडल से लेकर निःशुल्क, गैर-व्यावसायिक और समुदाय-आधारित सतत प्रकाशन प्रणालियों तक ऐसे अनेक दृष्टिकोण उभर रहे हैं जो ज्ञान को एक साझा संसाधन के रूप में देखते हैं, न कि एक व्यावसायिक वस्तु के रूप में। यूनेस्को की ओपन साइंस संबंधी अनुशंसा को अपनाकर 193 देशों ने इन प्रयासों के महत्व को स्वीकार किया है। अब समय है कि चर्चाओं से आगे बढ़कर ऐसे ठोस कदम उठाए जाएँ जो ज्ञान-साझाकरण को उसके मूल उद्देश्यों के अनुरूप बनाएं।

ओपन एक्सेस सप्ताह 19 से 25 अक्टूबर 2026 के बीच आयोजित किया जाएगा। हालांकि, समुदायों को वर्ष भर अपनी सुविधा के अनुसार चर्चाएँ आयोजित करने और पहल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। संस्थान और संगठन इस विषय को अपने स्थानीय संदर्भों के अनुसार अनुकूलित कर सकते हैं और उन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं जो उनके लिए सबसे अधिक प्रासंगिक हैं। इसके लिए अनुकूलन योग्य ग्राफिक्स टेम्पलेट भी उपलब्ध हैं।

इस घोषणा के अन्य भाषाओं में अनुवाद, थीम से संबंधित ग्राफिक्स तथा विस्तृत जानकारी openaccessweek.org पर उपलब्ध है। इस सप्ताह का आधिकारिक हैशटैग #OAWeek है।

SPARC के बारे में

SPARC एक गैर लाभकारी संगठन है, जो अनुसंधान और शिक्षा के लिए खुली प्रणालियों को बढ़ावा देता है, ताकि हर व्यक्ति, हर स्थान पर, ज्ञान तक पहुँच सके, उसमें योगदान दे सके और उससे लाभान्वित हो सके। अंतर्राष्ट्रीय ओपन एक्सेस सप्ताह की शुरुआत SPARC और छात्र समुदाय के साझेदारों द्वारा वर्ष 2008 में की गई थी। अधिक जानकारी के लिए sparcopen.org देखें।

अंतर्राष्ट्रीय ओपन एक्सेस सप्ताह के बारे में

ओपन एक्सेस सप्ताह वैश्विक स्तर पर ज्ञान के खुले आदान-प्रदान को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण अवसर है, जो नीतिगत प्रगति और सामाजिक सरोकारों के साथ जुड़ा हुआ है। यह आयोजन विश्वभर के व्यक्तियों, संस्थानों और संगठनों द्वारा मनाया जाता है तथा एक वैश्विक सलाहकार समिति द्वारा समन्वित किया जाता है, जो प्रत्येक वर्ष की थीम निर्धारित करती है। इसका आधिकारिक हैशटैग #OAWeek है।

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